

शहर से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित मेनार में यह उत्सव मुगलों पर ऐतिहासिक विजय की स्मृति में मनाया जाता है। रातभर गांव तोपों और बंदूकों की गर्जना से गूंजता रहा। तलवारों की चमक और बारूद के धमाकों के बीच युद्ध जैसा दृश्य साकार हो उठा। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में हथियारों के साथ उत्साहपूर्वक शामिल हुए, जिससे पूरा माहौल शौर्यगाथा की याद दिलाता नजर आया।
इतिहास के अनुसार मुगलों पर विजय के उपलक्ष्य में तत्कालीन महाराणा प्रताप ने मेनार को 17वें उमराव की उपाधि प्रदान की थी। साथ ही शाही लाल जाजम, नागौर का रणबांकुरा ढोल तथा सिर पर किलंगी धारण करने का विशेष अधिकार भी दिया गया था। यह सम्मान आज भी गांववासी गर्व के साथ निभा रहे हैं।
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इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए आसपास के करीब 200 गांवों से हजारों लोग मेनार पहुंचे। विदेशों में रह रहे मेनारवासी भी विशेष रूप से इस अवसर पर गांव लौटे। परंपरा के अनुसार शाम 5 से 7:30 बजे तक ग्रामीणों ने मेहमानों का पारंपरिक तरीके से स्वागत-सत्कार किया गया।
देर रात तक बारूद की गर्जना और पारंपरिक शौर्य प्रदर्शन के बीच बारूद की होली का यह जश्न मनाया गया। यह विजय उत्सव एक बार फिर मेनार की ऐतिहासिक पहचान और राजस्थान की गौरवशाली परंपरा को जीवंत करने की एक अनोखी परंपरा है, जिसे देखने राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, सहित कई जिलों के लोग आते है। इतना ही नहीं इस अद्धभुत नजारे को देखने के लिए देशी-विदेशी सैलानी भी मेनार गांव पहुंचते है और रंग-बिरंगे वस्त्र पहने हुए बंदूकों तोपों की होली को अपने कैमरे में संजोते हैं।