

सुबह करीब 10 बजे से ही भक्तों का मंदिर पहुंचना शुरू हो गया था। मंदिर की सीढ़ियों से लेकर मुख्य द्वार तक लंबी कतारें लगी रहीं। श्रद्धालु अपने आराध्य को गुलाल अर्पित कर उनके संग होली खेलने के लिए घंटों इंतजार करते नजर आए।
कल चंद्रग्रहण के कारण मंदिर में पारंपरिक होली नहीं खेली जा सकी थी और दोपहर बाद मंदिर के पट बंद कर दिए गए थे। इसी वजह से गुरुवार को श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रही। भक्तों ने ठाकुरजी के साथ गुलाल उड़ाकर अपनी आस्था प्रकट की और मंगलकामनाएं कीं।
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मंदिर के भीतर चंग की थाप पर फाग गीत गूंजते रहे। बुजुर्ग, युवा और महिलाएं भक्ति भाव में झूम उठीं। जयकारों और गुलाल की रंगत से पूरा परिसर रंगमय हो गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आस्था और रंगों की चादर एक साथ बिछ गई हो।
उदयपुर की इस पारंपरिक होली में देश-विदेश से आए पर्यटक भी शामिल हुए। विदेशी सैलानियों ने मेवाड़ी संस्कृति का आनंद लेते हुए ठाकुरजी के साथ गुलाल उड़ाया और इस खास पल को अपने कैमरों में कैद किया।
उत्सव की शुरुआत भगवान के पंचामृत स्नान और विशेष शृंगार से हुई, जिसके बाद फाग का दौर चला। वैष्णव परंपरा के अनुसार अब रंगपंचमी तक डोल उत्सव के तहत कृष्ण मंदिरों में इसी तरह होली की धूम रहेगी और ठाकुरजी के संग गुलाल की होली जारी रहेगी।
मंदिर में होली खेलने आए श्रद्धालुओं ने बताया कि भगवान के मंदिर में होली खेलने से उन्हें विशेष आनंद और संतोष की अनुभूति होती है। उनका कहना था कि इस पावन माहौल में ऐसा लगता है मानो स्वयं भगवान उनके बीच उपस्थित हों।