

-राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले की मांडणा कला- जो मिट्टी और चूने से बने पारंपरिक चित्र महिलाएं घरों की दीवारों पर बनाती हैं, जो शुभता और समृद्धि का प्रतीक है।
-मध्यप्रदेश की गोंड पेंटिंग- पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और लोककथाओं को सजाने वाली यह कला विश्व प्रसिद्ध है।
-महाराष्ट्र की वारली पेंटिंग- सफेद रंग से मिट्टी की दीवारों पर बने मानव आकृतियों वाले चित्र जीवन के उत्सव और एकता का प्रतीक है।
झारखंड की सोहराई पेंटिंग- यह कला फसल कटाई और पशुपालन से जुड़ी खुशियों का चित्रण करती है, मिट्टी के प्राकृतिक रंगों में गढ़ी जाती है।
-राजस्थान के बारां की सहरिया भित्ति चित्रकला- जंगल और जीव जंतुओं से प्रेरित पारंपरिक लोकचित्र, जो आदिवासी जीवन की सरलता को दर्शाते हैं।
-गुजरात की पिथोड़ा पेंटिंग- भील जनजाति की यह पारंपरिक चित्रकला, धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर बनाई जाती है, जिसमें देवताओं और नृत्य दृश्यों का वर्णन होता है।
-बंगाल की संथाल कला- नृत्य और लोकसंगीत से भरे चित्र संथाल समुदाय की जीवंत संस्कृति को बयान करते हैं।
-ओडिशा की कुरुंबा और सोहरा कला- इन पेंटिंग्स में प्रकृति, पशु-पक्षी और लोककथाओं का सुंदर संगम दिखाई देता है।
-कोटा, बूंदी की मीणा जनजातीय कला- रंगों की नाजुकता और भावों की गहराई से भरी ये भित्तियां जनजीवन की झलक पेश करती हैं।
-डूंगरपुर और झाबुआ मध्यप्रदेश की भील पेंटिंग्स- बिंदुओं और प्रतीकों के माध्यम से जीवन के त्योहारों और लोकदेवताओं का चित्रण करती हैं।
-मेवाड़ की गवरी थीम पेंटिंग्स- गवरी नाट्य परंपरा पर आधारित यह कलाकृति मेवाड़ की सांस्कृतिक आत्मा को दर्शाती है।
-अन्य पैनल में आदिवासी शादी-ब्याह की रस्मों के रंग, संगीत और परंपरा को उकेरा है।